दिव्यांगजनों के प्रति समाज की अभिवृत्तियाँ एवं चुनौतियाँः एक समाजशास्त्रीय विश्लेषण

 

ममता1, निशी यादव2

1शोध छात्रा, समाजशास्त्र विभाग, लखनऊ विश्वविधालय, लखनऊ

2असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, कृष्णा देवी गर्ल्स डिग्री कॉलेज, लखनऊ.

*Corresponding Author E-mail:

 

ABSTRACT:

आमतौर यह देखा जाता है कि दिव्यांगजनों द्वारा सामना की जाने वाली बाधाओं की एक बड़ी संख्या सामाजिक दृष्टिकोण से उत्पन्न होती है। दिव्यांगता एक जटिल घटना है जो केवल किसी विशेष व्यक्ति के शरीर, मस्तिष्क उसके परिवेश को भी चुनौतीपूर्ण बनाती है। दिव्यांगजनों को अक्सर सामाजिक-सांस्कृतिक कलंक के साथ जीना पड़ता है जिसके कारण दिव्यांगजनों को हाशिये पर रखा बहिष्कृत किया जाता है। समाज में अशिक्षा, अज्ञानता, गरीबी सामाजिक-सांस्कृतिक रुढ़िवादी विचारों ने दिव्यांगजनों को गम्भीर रूप से प्रभावित किया है। ये लेख दिव्यांगजनों के प्रति सामाजिक-सांस्कृतिक, क्रिया-प्रतिक्रिया एवं अभिवृत्तियोँ पर आधारित है। जिसमें द्वितीयक स्रोतों के माध्यम से दिव्यांगजनों के प्रति समाज की अभिवृत्तियोँ एवं चुनौतियोँ को समझने का प्रयास किया गया है। साथ ही समाज का दिव्यांगजन के प्रति कैसी क्रिया-प्रतिक्रिया है और उनके सामने आने वाली चुनौतियोँ को जानने का प्रयास किया गया है। जिससे इस समूह को समाज में होने वाली समस्याओं का पता लगाया जा सके और समाज की मुख्यधारा से जोड़ने चुनौतियों को कम किया जा सके ताकि इन्हें स्वावलंबी और समाज में समानता प्राप्त हो सके।

 

KEYWORDS: क्रिया-प्रतिक्रिया, समाज, दिव्यांगता, अभिवृत्तियाँ, चुनौतियाँ।

 

 


INTRODUCTION:

दिव्यांगता एक जटिल घटना है जो केवल किसी व्यक्ति के शरीर मस्तिष्क को बल्कि उसके आस-पास के परिवेश को दुर्गम बनाती है। दिव्यांगता अक्सर सामाजिक-सांस्कृतिक कलंक के साथ जुड़ी हुयी होती है। जब कोई व्यक्ति शारीरिक, मानसिक रूप से स्वास्थ्य हो उसे किसी प्रकार की स्वास्थ्य से सम्बन्धित क्षति हो और वह व्यक्ति उपस्थिति वातावरण में अपने आपको समायोजित कर लेता है तो उसे सामाजिक नजरिये से स्वास्थ्य माना जाता है।

 

दिव्यांगता से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसके शारीर का कोई अंग होना या अंग का बेकम होना या शारीरिक मानसिक रूप से किसी प्रकार की विकृति से पीड़ित होना। इस प्रकार कीदिव्यांगता के कई कारण हो सकते है जैसे-जन्मजात और आकस्मिक दुर्घटना से होने वाली दिव्यांगता।दिव्यांगता को दो प्रकार से समझ सकते हैं- एक सामाजिक दूसरा शारीरिक, दिव्यांगता को शारीरिक क्षति के रूप में देखा जाता हैं या कुछ विशेष तरह के कार्यों को कर पाने की शारीरिक असमर्थता है। वहीं दूसरी ओर जब दिव्यांगता को सामाजिक रूप से समझने की कोशिश करते है, तो यह समाज द्वारा तय किए गए दायरों और पैमानों पर खरा उतरने के कारण किये जाने वाला प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष बहिष्कार हैं। जब दिव्यांगता के इन दोनों पक्षों का गहनता से विश्लेषण करते हैं। तो हम सरलता से समझ सकते है कि दिव्यांगता की अवधारणा शारीरिक असक्षमता कम और सामाजिक अधिक है। इस दावे की पुष्टि करने वालाएक नवीन मॉडल दिव्यांगता का सामाजिक मॉडल हैइसके अनुसार किसी दिव्यांग व्यक्ति की शारीरिक असक्षमता से अधिक समाज का रवैया उसे असमर्थ और अकेला बनाता है। एनटोनक और अन्य का कहना है कि दिव्यांगजनों द्वारा सामना की जाने वाली बाधाएँ भी समाज के माध्यम से ही उत्पन्न होती एनटोनक और अन्य (2000) है।

 

विभिन्न समाजों में दिव्यांगता को विविध तरीकों से देखा जाता है। अधिकांश विकसित देशो ंमें दिव्यांगता को मानव जीवन का हिस्सा माना जाता है। ऐसे समाज में ऐसी व्यवस्थाएँ की जाती हैं कि एक दिव्यांग व्यक्ति रोजमर्रा की हर गतिविधि में हिस्सा ले सके। इन जगहों पर अधिकतर लोग यह मानते हैं कि स्थाई या अस्थाई रूप से हर व्यक्ति अपने जीवन में दिव्यांगता को कभी कभी महसूस करता है। यही कारण है कि यहाँ दिव्यांगता को एक सामान्य प्राकृतिक घटना की तरह देखा जाता है। किन्तु गैर-विकसित और अशिक्षित समाज में दिव्यांगता को व्यक्ति की निजी समस्या के रूप में देखा जाता है। दिव्यांगता को अक्सर पूर्वजन्म के बुरे कर्मों से भी जोड़ दिया जाता है। ऐसे समाज में आधारभूत संरचनाओं को दिव्यांगजनों के लिए सुगम्य बनाने पर कोई खास ध्यान नहीं दिया जाता। ऐसे स्थानों पर दिव्यांगजन के पास कोई विशेषाधिकार भी नहीं होते है। अतः यह कहा जा सकता है कि दिव्यांगता एक सापेक्ष (परिस्थिति) शब्द है- जिसका अर्थ विभिन्न व्यक्तियों के लिए भिन्न होता है।

 

दिव्यांगता को सामाजिक निर्माण माना जाता है सामाजिक निर्माण से तात्पर्य है कि दिव्यांगता का निर्माण जैविक अन्तरो के बजाय सामाजिक अपेक्षाओं और संस्थानों द्वारा किया जाता है। दिव्यांगजनों के अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (2006) दिव्यांगता कोएक विकसित अवधारणाके रूप में वर्णित किया है जो दिव्यांगजनों की मनोवृत्तियाँ और पर्यावरणीय बाधाओं के पारस्परिक विचार-विमर्श के परिणामस्वरूप होता है। जो अन्य के साथ समानता के आधार पर समाज में उनकी पूर्ण और प्रभावी भागीदारी में बाधा डालते है। इससे यह स्पष्ट होता है कि दिव्यांगजनों को केवल चिकित्सा अवधारणा के सन्दर्भ में नहीं समझा जा सकता, बल्कि इसे एक समग्र अनुभव के रूप में समझा जा सकता शैनी और कपूर (2020) है। जब किसी व्यक्ति में शारीरिक मानसिक समस्या होती है जो स्वास्थ्य की सामाजिक पहुँच में एक हानि, प्रतिबन्ध या सीमा पैदा करती है। ऐसे व्यक्ति को दिव्यांगता के रूप में लेबल किया जाता है।

 

साहित्य समीक्षा:-

इस विषय पर साहित्य समीक्षा महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समझने में मदद करती है कि कैसे साहित्य ने इस क्षेत्र में सोच और दृष्टिकोण को प्रेरित किया है साहित्य में दिव्यांगजनों के प्रति समाज में परिवर्तन को समीक्षा और उदाहरणों के माध्यम से समझा जा सकता है। जिससे इस क्षेत्र में सुधार करने के लिए उपयुक्त मार्गदर्शन मिल सके। जैसा- कि दिव्यांगता सिद्धांत के प्रति कई सामाजिक दृष्टिकोण विकसित हुए जिन्हें दिव्यांगता अध्ययन के रूप में जाना जाता बुहालिस और अन्य. (2011) है। दिव्यांगता को अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो दिव्यांगता’’ शब्द विविध संस्कृतियों के लिये भिन्न-भिन्न होती है। जैसे- किसी व्यक्ति का अपने जीवन में अक्षमता से ग्रस्त होना उसे चलने, देखने या सुनने जैसी प्रमुख गतिविधियों में आसानी से भाग लेने से रोकता है ऐसे शब्द दिव्यांगता की परिभाषा बन जाते ब्रोंन एस.(2002) है।

 

गुलियानी आर (2017) का कहना कि दिव्यांगता किसी व्यक्ति की शारीरिक या संज्ञानात्मक सीमाओं का हवाला देकर व्यक्ति की नुकसान या अक्षमताओं पर है इसी प्रकार दिव्यांगता भी अक्षमता की कमी पर केन्द्रित है। इसीलिए व्यक्ति की हानि या उनकी त्रासदी पर जोर देती है। समाज में दिव्यांगता व्यक्ति-दर-व्यक्ति यहाँ तक जीवन के विभिन्न चरणों में दिव्यांगता एक ही व्यक्ति के लिये भिन्न हो सकती है। कु० गणेश और अन्य, का कहना कि जो कि गंभीर रूप से दिव्यांग है बच्चों सहित एक अरब से अधिक दिव्यांग है। जो कि दुनिया की लगभग 15 जनसंख्या है जो दिव्यांगता के साथ जी रहें कु० गणेश और अन्य. (2012) है।

 

दिव्यांगजनों की समस्याएँ जटिल है उपलब्ध संसाधन भी दुर्लभ है। सामाजिक कलंक अभी भी जुड़ा हुआ है और लोगों का व्यवहार नकारात्मक है। दिव्यांगता के कारणों का विश्लेषण चिकित्सा या जैव केन्द्रित दृष्टिकोण पर जोर देता है। अधिकतर रोग वंशानुगत और जन्म दोष तथा पर्यावरणीय कारक है। किसी व्यक्ति के बुनियादी सेवाओं तक पहुँच की कमी भी या गर्भकाल से दिव्यांग हो जाना गरीबी, पोषण की कमी अनुचित नशीली दवाएँ लेना धूम्रपान, सिगरेट गर्भकाल की अवस्था में माँ का बीमार हो जाना इत्यादि दिव्यांगता के कारणों को दर्शाते कुमार पी और अन्य.(2015) है। दिव्यांगजन की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक चुनौतियाँ तथा समाज में दिव्यांगजनों के प्रति समाज की अभिवृत्तियाँ एवं व्यवहार को समझने का प्रयत्न किया गया है।

 

उद्देश्य:-

(1) दिव्यांगजनों के प्रति समाज की अभिवृत्तियोँ एवं क्रिया-प्रतिक्रिया को समझना।

(2) दिव्यांगजनों के प्रति सामाजिक आर्थिक चुनौतियों को समझना।

 

दिव्यांगजनों की चुनौतियाँ:-

(1) समाज की क्रिया-प्रतिक्रिया एवं अभिवृत्तियाँ-

समाज मनुष्य के जीवन के उद्देश्यों को प्राप्त करने में मदद करता है, समाज मनुष्यों के जीवन में अहम भूमिका निभाता है। समाज जीवन के लक्ष्य का निर्धारण करने का एक जरिया है हम समाज को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों रूपों में ग्रहण करते है, प्रत्यक्ष रूप में ग्रहण करना हो तो हम स्कूल, कॉलेज, किताबों के माध्यम से शिक्षित हो सकते है, और वहीं दूसरी ओर अप्रत्यक्ष रूप से माता-पिता, भाई-बहन, मित्रों से और बड़ों से भी व्यवहारिक ज्ञान प्राप्त कर सकते है। सामाजिक अभिवृत्तियाँ कई श्रोतों से ग्रहण की जाती है, जैसे- टीवी देखने से विज्ञापन के माध्यम से, इतिहास, यात्राओं, किताबों इत्यादि श्रोतों के माध्यम से हम समाज को ग्रहण करते है।

 

मर्फी का कहना कि, दिव्यांगजनों के प्रति समाज की अभिवृत्तियाँ लोगों द्वारा देखने का एक नजरिया है। जिस नजरिये से व्यक्ति अपने विचारों के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति का मूल्यांकन करता है यह मूल्यांकन समाज में नकारात्मक या सकारात्मक रूप में होता मर्फी.(1990) है।

 

समाज में बड़े पैमाने पर दिव्यांगता को समस्या के रूप में माना जाता है। भारतीय समाज के परिवारों में दिव्यांगता को भगवान का उपहार मानते है। दिव्यांग व्यक्ति को सामाजिक संरचना के अनुकूल नही माना जाता है समाज में इसीलिए दिव्यांगजनों को सामान्यतः सामाजिक रूप से पृथक कर दिया जाता घई एन और अन्य. (2015) है।

 

कई मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि दिव्यांगता कोई व्यक्तिगत स्वास्थ्य समस्या नही है, बल्कि वास्तव में यह समस्या सामाजिक रूप से निर्मित होती है। जिसके परिणाम स्वरुप लोगों के नकारात्मक व्यवहार ने दिव्यांगजनों को समाज की मुख्य धारा में शामिल होने में बाधा उत्पन्न करते है। जिससे दिव्यांगजन मुख्य धारा से वंचित और हाशिये का शिकार होते मिश्र कुमार एस. (2018) है।

 

दिव्यांगता सामाजिक सम्बन्धी पैमाना (माप) के माध्यम से कई कार्य सम्बन्धी स्थितियों में विशिष्ट दिव्यांगता समूहों के सदस्यों के दृष्टिकोण की जाँच करने पर स्ट्रोहमर, डगलस सी, और और अन्य ने पाया कि-आमतौर पर दिव्यांगता दृष्टिकोण के पदानुक्रम और सामाजिक दूरी अंतःक्रिया की सीमा कुछ चुनौतीपूर्ण है। जैसे- कार्यस्थलो में कार्य के दौरान दिव्यांगजन का गिर जाना या पीछे रह जाना इससे गैर दिव्यांगजनों को कोई आश्चर्य नही होता। दिव्यांगजन को जीवन साथी चुनने या डेटिंग संबधी माप से ज्ञात होता है कि गैर दिव्यांगजन समाज के भय से असहज महसूस करते स्ट्रोहमर डगलस सी और अन्य. (2015) है। दिव्यांगजनों को सामाजिक दृष्टिकोण से कलंकित माना जाता रहा है। दिव्यांग व्यक्तियों को पृथक करने का निर्णय रुढ़िवादिता है, रुढ़िवादी विचारों ने भेदभाव को कायम रखा है तथा समाज द्वारा कृत्रिम रेखा ने दिव्यांगजनों को पृथक किया कप्लन डी. (2000) है।

 

डार्शी एस और अन्य के अनुसार:- बहोत से प्रदाता दिव्यांग समूह की जरूरतों को पूरा करने के लिय पहुँच और सेवा प्रावधान विकसित करने में आगे नहीं रहें है, पश्चिमी देशों में मानवाधिकार कानून ने सेवा प्रदाताओं को खुले तौर पर भेदभाव करने से रोकने में लाभकारी प्रभाव डाला है। किन्तु समग्र रूप से उद्योग सार्वभौमिक पहुँच के लिए दिव्यांगता जागरूकता की अवधारणाओं को अपनाने में अनिच्छुक रहें डार्शी एस और अन्य. (2005) है।

 

दिव्यांगजनों को अपनी जीवन योजना बनाने और उसे साकार करने की क्षमता एक सक्षम सामाजिक, सांस्कृतिक ढांचे द्वारा बाधित होती है। जो दिव्यांगजनो के अनुभवों और दृष्टिकोणों को हाशिये पर रखती है। जबकि माना जाता है कि लोग अपने स्वास्थ्य देखभाल सम्बन्धी निर्णय लेने का कानूनी अधिकार रखते है। केवल निर्णय लेने के व्यक्तिगत कार्यो पर ध्यान केन्द्रित करने के बजाय हमें उस सामाजिक, सांस्कृतिक संरचना पर ध्यान देने की आवश्यकता है जो लोगों के निर्णय को तय करती हो अनिता. (2008) है।

 

दिव्यांगता को समाज में बीमारी के रूप में माना गया है दिव्यांगजनों को शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्तियों के बीच सामाजिक सम्बन्ध तनावपूर्ण और समस्याग्रस्त स्थिति का अनुभव करातें है इस स्थिति का सामना लगभग सभी दिव्यांगजन करते है। और वे दूसरों के जिज्ञासापूर्ण बहुत से प्रश्नों का सामना करते है और उनका उत्तर देने में असमर्थ होते है। दिव्यांगजन पूर्वाग्रह भेदभाव और परिहास के रूप में सामाजिक बाधाओं का सामना कर रहें है एवं समूह में रहते हुए भी वे दया के पात्र बन जाते है। समाज से खुद को पृथक समझते है जो एक प्रकार की अलगाव की स्थिति उमर जैन सोफी और अन्य. (2011) है।

 

(2) समाज में दिव्यांगजनों की चुनौतियाँ:-

दिव्यांगजनों को अक्सर चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, सामाजिक चुनौतियों में शारीरिक शोषण,मारना, धक्का देना, आवश्यकता पड़ने पर सहायता देना, व्यक्तिगत स्वच्छता के साथ अन्य समस्याएँ। यौन शोषण, भावनात्मका या मानसिक शोषण, सेवाओं तक सीमित पहुँच संस्थागत चुनौतियाँ (कथित समर्थन आवश्यकताओं के कारण उचित सेवा तक पहुंच से वंचित) उपेक्षा व्यवहार सम्बन्धी चुनौतियाँ दिव्यांगजनों को आमतौर पर स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और स्वास्थ्य सुविधाओं के अन्य कर्मचारियों द्वारा पूर्वाग्रह, कलंक और भेदभाव के अनुभवों की रिपोर्ट करते है। कई सेवा प्रदाताओं के पास दिव्यांगजनों के अधिकारों और उनकी स्वास्थ्य सम्बन्धी जरूरतों के बारे में सीमित जानकारी और सीमित समझ जिसके कारण दिव्यांगजनों को अनेको चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

 

(3) स्वास्थ्य से सम्बन्धित चुनौतियाँ:-

कई स्वास्थ्य सेवाओं में दिव्यांगजनों की आवश्यकताओं को समायोजित करने के लिए नीतियाँ नहीं है। जबकि कुछ नीतियों में लम्बे और लचीले नियुक्ति समय की अनुमति देना, बाहर की सेवाएँ प्रदान करना और दिव्यांगजनों के लिए लागत कम करना आदि शामिल है। दिव्यांग महिलाओं को प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं और सूचनाओं में विशेष बाधाओं का सामना करना पड़ता है। स्वास्थ्य कार्यकर्ता अक्सर गलत धारणा बनाते है कि दिव्यांग महिलाएं अलैंगिक या माँ बनने योग्य नही है। दिव्यांगजनों से शायद ही कभी उनकी राय मांगी जाती हो,या दिव्यांगजनों को स्वास्थ्य सेवाओं के प्रावधान के बारे में निर्णय लेने में शामिल किया जाता हो।

 

(4) दैनिक जीवन से सम्बन्धित चुनौतियाँ:-

स्वास्थ्य सेवाएँ और गतिविधियाँ अक्सर उस स्थान से दूर स्थित होती है जहाँ अधिकांष लोग रहते है या ऐसे क्षेत्र में जहाँ पहुचं योग्य परिवहन विकल्प उपलब्ध नहीं होते है इमारते या सेवाओं के प्रवेश द्वार पर सीढियाँ और फर्श पर स्थित गतिविधियाँ जहाँ लिफ्ट की दुर्गम पहुंच होती है। दुर्गम शौचालय मार्ग, दरवाजे, कमरे और जो व्हीलचेयर उपयोगकर्ता को समायोजित नहीं करते है। यह स्थिति दिव्यांगजनों के लिए गम्भीर समस्या है कक्षाओं परीक्षा में कुर्सियों सहित निश्चित ऊँचाई के फर्नीचर आदि का दिव्यांगजनों को उपयोग करना मुश्किल हो होता है। स्वास्थ्य सुविधाओं और गतिविधियोँ के लिए अन्य स्थानों पर अक्सर खराब रोशनी होती है, स्पष्ट संकेत नहीं होते है या भ्रमित करने वाले तरीके से बिछाए जाते है जिससे दिव्यांगजनों को रास्ता खोजना कठिन हो जाता है। संचार करने में असमर्थ श्रवण बाधित दिव्यांगजनों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं में एक प्रमुख बाधा स्वास्थ्य पर लिखित सामग्री या सांकेतिक द्विभाषी भाषाओं की सीमित उपलब्धता है। स्वास्थ्य सम्बन्धित जानकारी सुलभ प्रारूपों में उपलब्ध नहीं है जिससे दृष्टिबाधित लोगों के लिए एक बाधा उत्पन्न होती है। स्वास्थ्य सम्बन्धित जानकारी को जटिल तरीके से प्रस्तुत किया जाता है या बहुत सारे शब्दजाल का उपयोग किया जाता है। आसान से आसान प्रारूपों में स्वास्थ्य जानकारी उपलब्ध कराना जिसमें सादा भाषा और अन्य चित्र या अन्य दृश्य संकेत शामिल है, संज्ञानात्मक हानि वाले लोगों के लिए पालन करना आसान बना सकता है।

 

(5) शिक्षा एवं रोजगार से सम्बन्धित चुनौतियाँ:-

सीमित सुविधाएँ दिव्यांगजनों के लिए जैसे रैंप, श्रवण यंत्र और शिक्षकों अन्य छात्रों की अज्ञानता दिव्यांग व्यक्ति के लिए उपयुक्त शिक्षा सामग्री की अनुपलब्धता गलत धारणाओं के कारण समस्या होती है और वित्तीय समस्याएँ आर्थिक असुरक्षा सामाजिक स्थितियों के कारण दिव्यांगजनों को अक्सर शिक्षा योजनाओं के पहुँच में समस्याओं का सामना करना पड़ता है। अनुपलब्ध रोजगार के अवसर, भेदभाव और अन्याय, कार्यस्थलों पर सुविधाओं की कमी आदि जटिल समस्याएँ व्याप्त है।

 

(6) वित्तीय सम्बन्धी चुनौतियाँ:-

अल्प आय वाले देशों में अधिकतर दिव्यांगजन उचित स्वास्थ्य देखभाल नहीं कर सकते, वित्तीय सहायता के अभाव में दिव्यांगजनों के प्रति दुर्व्यवहार की अधिक संभावना बनी रहती है दिव्यांगता से ग्रस्त बहुत से दिव्यांगजन यह भी रिपोर्ट करते है कि स्वास्थ्य सेवा की प्राप्ति के लिए यात्रा करने दवा के लिए भुगतान करने से जुडी लागतों को वहन करने में असमर्थ है। स्वास्थ्य सेवा प्रदाता को देखने के लिए भुगतान की लागत को छोड़ ही दो, इसके अतिरिक्त दिव्यांगजनों को कई समस्योँ का सामना करना पड़ता डब्ल्यू एच. . रिपोर्ट. (2020-2021) है।

 

दिव्यांगजनों के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण एक महत्वपूर्ण मुद्दा है, जिसका उद्देश्य है दिव्यांग व्यक्ति को समाज में स्वतंत्र और समानता का स्थान प्रदान करना दिव्यांगजनों के प्रति समाज की अभिवृत्तियोँ एवं व्यवहार में धीरे-धीरे परिवर्तन हो रहा है। किन्तु अभी भी कई चुनौतियाँ है, दिव्यांगजनों को भेदभाव कलंक का अक्सर सामना करना पड़ता है अधिकतर व्यक्ति दिव्यांगजनों को असहाय मानते है यहाँ तक दिव्यांगजनों को आर्थिक, सामाजिक असमानताओं का सामना करना पड़ता है।

 

निष्कर्षः

व्यक्ति समाज में अपने अवलोकनात्मक दृष्टिकोण के माध्यम से किसी अन्य व्यक्ति का मूल्यांकन करता है। यह मूल्यांकन समाज द्वारा सकारात्मक और नकारात्मक किसी भी रूप में हो सकता है। इसी प्रकार से समाज में दिव्यांगता को मजबूत या कमजोर, सक्रिय या निष्क्रिय समझा जाता है। दिव्यांगजनों के प्रति नकारात्मक अभिवृत्तियाँ समाज के साथ एकता में बाधा उत्पन्न करती हैं। सामान्यतः देखा गया है कि उपेक्षित अभिवृत्तियोँ के कारण दिव्यांगजनों को समाज में समानता का अनुभव नही हो पाता है। अभिवृत्तियोँ से उन्हें दया का पात्र समझा जाता है अभिवृत्तियाँ ऐसा कारक है जो शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति और दिव्यांगजन के बीच अंतर-व्यक्तिगत सम्बन्धों को प्रभावित करती है। समाज दिव्यांगजन के लिए सहायक तकनीक का उपयोग कर रहा है, कुछ कम्पनियाँ रोजगार के अवसर प्रदान कर रही है, सामाजिक संगठन दिव्यांगजनों के अधिकारों के लिए काम कर रहें है। दिव्यांगता और दिव्यांग व्यक्तियों के प्रति दृष्टिकोण पर शोध लगातार हो रहें है, लेकिन इसमें शामिल मुद्दों के लिए अभी भी बहुत कुछ करने साथ ही अभिवृत्तियोँ और व्यवहार को बदलने के लिए हमें जागरूकता बढानें और, बुनियादी ढाँचे का विकास करने की आवश्यकता है।

 

संदर्भ सूची

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Received on 30.11.2024      Revised on 28.12.2024

Accepted on 10.02.2025      Published on 25.03.2025

Available online from March 31, 2025

Int. J. of Reviews and Res. in Social Sci. 2025; 13(1):21-26.

DOI: 10.52711/2454-2687.2025.00004

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